यात्रा में हैं शब्द by भोलानाथ कुशवाहा
साहित्य जब पत्रकारिता के अनुभव और संवेदनशीलता की स्याही में डूबकर निकलता है, तो वह गंभीर चिंतन का ज्ञान-कलश बन जाता है। एक ऐसा कलश जिसके द्रव का पान करके समाज यथार्थ का दर्शन कर पाता है, कड़वी सच्चाईयाँ को आत्मसात कर पाता है, निरंकुश और मनमानी सत्ता का विरोध कर पाता है, जीवन में विपरीत परिस्थियाँ आने पर संघर्ष कर पाता है और सही रास्ते पर चलने के लिए मार्गदर्शन पाता है। श्री भोलानाथ कुशवाहा जी का प्रस्तुत संग्रह ‘यात्रा में हैं शब्द’ इसी सत्य का साक्ष्य है। यह कविताएँ बताती हैं कि शब्द स्थिर नहीं हैं; वे चल रहे हैं, ‘सड़क से संसद तक’ और पगडंडियों से लेकर अंतरिक्ष की ऊँचाइयों तक। समय के पृष्ट पर शब्दों की यह पद यात्रा लोक का मार्गदर्शन कर रही है। एक दर्जन से अधिक पुस्तकें लिख चुके कुशवाहा जी की रचनाओं में स्त्री-विमर्श का अथाह सागर है । उनकी रचनाएं एक स्त्री की देह से अस्तित्व तक की लड़ाई में खोज-बीन कर रही हैं । संग्रह की शुरुआत ही स्त्री के बहुआयामी संघर्षों से होती है। कवि ने बड़ी बेबाकी से रेखांकित किया है कि स्त्री की प्रगति आज भी पुरुष की इच्छाशक्ति की बैसाखियों पर टिकी है। वे लिखते हैं- “स्त्री की असली प्रगति / तब होगी / जब वह अपने पैरों पर / खुद चले”। ‘घरों में औरतें मजदूर’ जैसी कविताएँ उस अदृश्य श्रम पर प्रहार करती हैं जिसे हम ‘ममता’ या ‘कर्तव्य’ का नाम देकर शोषण की परिधि से बाहर कर देते हैं। आधुनिक शहर की डरी हुई औरतों का चित्रण कर कवि ने विकास की उन चमकीली सीढ़ियों पर सवाल उठाया है जो स्त्री के लिए आज भी फिसलन भरी हैं। मानवीय संवेदना और सामाजिक विद्रूपता पर कुशवाहा जी ने अच्छी रचनाएं कीं हैं । उनकी कविताएँ ‘तनाव की सदी’ का दर्पण हैं। वे टूटे हुए संबंधों की ‘बेजान’ स्थिति पर शोक नहीं मनाते, बल्कि उन्हें पुनर्जीवित करने का आह्वान करते हैं। संग्रह में ‘श्रमिक’ और ‘मजदूर’ को विधाता मानकर उन्हें पूज्य बताया गया है, जो खुद अभावों में रहकर दुनिया के लिए ‘ताजमहल’ खड़ा करते हैं। श्रमिक पूज्य हैं इस धरती के गीत उन्हीं के गाते रहना उनसे है निर्माण धरा का उनकी कथा सुनाते रहना युद्ध और वैश्विक संकट का समय चल रहा है । पूरी दुनिया वर्चस्व की लड़ाई में अंधी हो रही है। ऐसे में कवि का स्वर मानवता के पक्ष में बुलंद होता है। ‘हम असहमत युद्ध से हैं’ और ‘युद्ध रोक लो’ जैसी रचनाएँ वैश्विक पंचायत की खामोशी पर करारा प्रहार करती हैं। वे चेतावनी देते हैं कि यदि यह रार न रुकी, तो हरी-भरी धरती ‘जल श्मशान’ बन जाएगी। अपने हित में लगे-जुटे सब किसको है परवाह जगत की मारे जा रहे हैं निरीह जन कौन सुने आह जगत की हरी-भरी धरती इसमें जल श्मशान हो जायेगी। युद्ध रोक लो वर्ना दुनिया तहस-नहस हो जायेगी । इस संग्रह की विशिष्टता इसकी विविधता में है। जहाँ एक ओर गंभीर चिंतन वाली कविताएँ हैं, वहीं दूसरी ओर दोहे, जो ‘मानवीयता’ और ‘राजनीति’ पर कबीर जैसी स्पष्टवादिता रखते हैं। ग़ज़लें, जो “मोहब्बत को निभाना है बहुत मुश्किल” जैसे अहसासों को सहलाती हैं। कुण्डलिया और आल्हा, जो लोक-संस्कृति की खुशबू को जीवित रखती हैं। बाप गधे को बोलो झट से, अपना काम साध लो जाय। उत्तर-दक्खिन बजे जहाँ से, तुरही अपनी देव बजाय। ‘यात्रा में हैं शब्द’ का हर शब्द अपने साथ एक अनुभव लेकर चलता है। इसमें एक पत्रकार की निर्भीकता और कवि की तरलता का अद्भुत सामंजस्य है। भोलानाथ जी ने ‘पंच परमेश्वर’ के ‘परमेश्वर’ बन जाने की त्रासदी से लेकर ‘मोबाइल’ में सिमटते बचपन तक का जो खाका खींचा है, वह पाठक को केवल पढ़वाता नहीं, बल्कि सोचने पर विवश करता है। यह संग्रह उन सभी के लिए है जो शब्दों की शक्ति में विश्वास रखते हैं और मानते हैं कि शब्द जब यात्रा पर निकलते हैं, तो वे मशाल बन जाते हैं। इन शुभकामनाओं के साथ कि श्री कुशवाहा जी के शब्द निरंतर यात्रा में गतिशील बने रहें…









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