कारवाँ-ए-अनहद ( Karwaan-E-Anhad )
by हिमांशु भारद्वाज ‘आनन्द’
कविता संग्रह
पुस्तक के बारे में –
आनंद धर्म, साहित्य, आध्यात्म की एक भरी पूरी संभावना हैं
सच कहूँ तो हिमांशु की पुस्तक कारवाँ-ए-अनहद ( Karwaan-E-Anhad ) पर कुछ लिखने को लेकर मैं बहुत गंभीर नहीं था और सोचा था कि बच्चे का मन रखने के लिए कुछ वाक्य लिख दूँगा, क्योंकि मैं वैसे भी एक बनिया हूँ न कि साहित्यकार। पाँच किताबें जरूर छप गईं, लेकिन वह मेरी जीवन यात्रा की अभिव्यक्ति हैं न कि कल्पनाजीवी कवि-कर्म।
खैर हिमांशु के भेजे पीडीएफ को स्क्रोल करने लगा तो कुछ कविताओं की पंक्तियाँ एकदम से फ्लैश करने लगीं और लगा कि भले ही युवा हिमांशु की यह पहली पुस्तक है, लेकिन उनके विचारों का फलक काफी गहरा और विस्तृत है। इनके चाचा मेरे पुत्रवत वीरेंद्र भारती से आध्यात्मिक चर्चा के क्रम में हिमांशु की आध्यात्मिक रुचि पर भी चर्चा होती थी, लेकिन मैं उनके विचारों की गहराई व उनकी शब्द अभिव्यक्ति से चमत्कृत हूँ।
“जिंदगी क्या है, महज सफर ही तो है,
जिस में बस रूह का असर ही तो है।”
यह एक शेर ही नहीं बल्कि पूरा जीवन दर्शन है, शास्त्रों का निचोड़ है।
“हर ओर चले प्यार ए कारवां”
यह एक नौजवान का ऐसा सपना है जो उसके निर्मल मन की अभिव्यक्ति है, चाहत है जिसे वह मूर्त होते देखना चाहता है।
“मंजिल तुम खुद हो, बस अपने भीतर तो उतर।”
अब यह पंक्ति अध्यात्म का गहरा निचोड़ है। “कस्तूरी कुण्डलि बसे, मृग ढूँढ़े बन माहि।” जैसा हाल मनुष्य का भी है क्योंकि तुलसीदास व गीता ने स्पष्ट कहा है कि “ईश्वर अंश जीव अविनाशी।” यानी यह जीव खुद ईश्वर का अंश है फिर किस मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च में ढूँढ़ने के लिए दुनिया दौड़ रही है।
“जब प्रेम में मुदित हो हृदय,
स्वयं में स्वयं का ध्यान करो।”
ध्यान का नाटक करने वालों के लिए यह कितना सहज निर्देश है कि मुदित हृदय हो अपने अंदर के ईश्वर का ध्यान, उसके प्रति कृतज्ञता भाव ही तो है । कबीर ने भी तो कहा है की-
आँख न मूँदूँ, कान न रूँधूँ , काया कष्ट न डारूँ ।
खुले नैन मैं हँसि-हँसि देखूँ, सुंदर रूप निहारूँ।
“मेरा जीवन भी हो औरों के लिए प्रेम की भाषा।”
कितनी सुंदर अभिलाषा है इस युवा रचनाकार की।
“कुछ परिंदे हैं लंबे सफर में,
कहीं घरौंदा बनाना नहीं चाहते।”
यह पंक्तियाँ आनंद की यायावर फक्कड़ी को अभिव्यक्त करती हैं, जहां गति ही गति है, स्वतंत्रता ही स्वतंत्रता है, बंधन मुक्त आकाश में उड़ते चले जाने की अनंत अभिलाषा है। इसी बात को वह अगली कविता ‘पथिक अकेला’ में भी व्यक्त कर रहा है। ‘क्या हाल हमारे’ कविता की यह पंक्ति देखिए –
“ऐसे शब्दों को ढूँढ़े मन,
जो लफ्जों से हों पूरे मौन।”
वही आध्यात्मिक प्यास है इसमें।
“आनंद तुम मार्ग तथागत लो,
फिर इस देह में कहाँ आना-जाना चलता है।”
यानी हर कविता में मुक्ति की कामना, ध्यान के मार्ग व मंजिल की को चाहना। सचमुच 25 वर्ष के युवा की यह दृष्टि उसको एक साधक के रूप में सामने लाती है। लेकिन साधक आनंद आगे बढ़ता है तो उसे तथागत की रूखी ध्यान पद्धति से भक्ति मार्ग की झलक मिलती है और वह कह उठता है-
“जब से हरी प्रेम में मन रंगा,
आनंद की हो संगत सत्संग में।”
मौन साधना पर यह भावाभिव्यक्ति देखिए-
“बस आत्मा से आत्मा तक,
एक शुद्धता का संचार हो।
मौन ही संवाद हो,
मौन ही आवाज हो।”
पुस्तक के शीर्षक कविता की यह पंक्ति कितनी सुंदर है आप खुद देखें-
“जो सुन ले खामोशी को,
वही अनहद को जाने।
बाकी तो दुनिया इसे,
बस अफसाना ही माने।”
युवा कवि पवित्र प्रेम में कैसे मुक्ति मार्ग देखता है इन पंक्तियों में देखें-
“मेरी वेदना को वेदांत से जोड़े,
मेरी चेतना का एकांत हो तुम।”
द्वितीय खंड “गांधी के चश्मे से भारत” कवि आनंद की गहन दृष्टि, देश, समाज व विश्व-बोध को दिखाती है।
“राम के आदर्शों से निर्माण का भारत,
कभी देखा है गांधी के चश्मों से भारत।”
आज की पीढ़ी का आह्वाहन करती है कि आओ और गांधी को समझो, तो तुम्हें राम के, कृष्ण के भारत के दर्शन हो जाएंगे।
अंत में इतना ही कहूँगा कि आनंद धर्म, साहित्य, आध्यात्म की एक भरी पूरी संभावना हैं। ईश्वर उनके अंदर के ईश्वर को और प्रकट करें, जिससे उनकी आध्यात्मिक साधना तो पूर्ण ही हो, इनको माध्यम बना ईश्वर समाज और संसार के लिए अपने मिलन का मार्ग प्रशस्त करें। बहुत आशीर्वाद, बहुत शुभकामनाएं आनंद! तुमने मुझे चमत्कृत भी किया है और चकित भी।
‘पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥’
संजीव कुमार गुप्ता
(साहित्यकार, समाजसेवी व उद्यमी)
एलिगेंट अप्लायंसेज,
कचहरी रोड, गाज़ीपुर
संस्थापक- उत्थान फाउंडेशन, गाजीपुर (उत्तर प्रदेश)
कवि परिचय-
हिमांशु भारद्वाज ‘आनंद’ उत्तर प्रदेश के गाज़ीपुर जनपद के निवासी हैं। आपके पिता श्री सुमेर राम सरोज एवं माता श्रीमती गीता देवी हैं। प्रारंभिक जीवन से ही आपको साहित्यिक संस्कार पारिवारिक वातावरण से प्राप्त हुए, जिनमें आपके पूज्य पिता जी की विशेष प्रेरणा रही है।
आपने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्नातक (B.A. Hons.) तथा लोक प्रशासन और राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधियाँ प्राप्त की हैं। इसके अतिरिक्त वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय से बी.एड. की डिग्री अर्जित की है। वर्तमान में आप टी.डी. कॉलेज, जौनपुर से राजनीति विज्ञान विषय में पीएच.डी. कर रहे हैं, जहाँ आपका शोध सामाजिक संरचनाओं और जनसरोकारों के गहन अध्ययन पर केंद्रित है।
आपका साहित्यिक लेखन सामाजिक यथार्थ, मानवीय संवेदनाओं और प्रेम के सूक्ष्म आयामों को प्रभावपूर्ण ढंग से अभिव्यक्त करता है। आपकी रचनाएँ पाठकों के अंतर्मन से संवाद स्थापित करते हुए उन्हें चिंतन की नई दिशाओं की ओर प्रेरित करती हैं। आप साहित्य को आत्मबोध, प्रेम और सामाजिक चेतना का सशक्त माध्यम मानते हैं।
आप निरंतर अध्ययन, चिंतन और सृजन के माध्यम से अपने लेखन को और अधिक परिष्कृत एवं प्रभावशाली बनाने में संलग्न हैं।









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